अहिंसा संयम और तप रूप धर्म उत्कृष्ट और मंगलकारी होता है: गुरुदेव श्री सौम्यदर्शन मुनि

 अहिंसा संयम और तप रूप धर्म उत्कृष्ट और मंगलकारी होता है: गुरुदेव श्री सौम्यदर्शन मुनि

मरू प्रहार संवादाता /
 अजमेर/    
गुरुदेव श्री सौम्यदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया कि इस संसार में बहुत सारे धर्म है और सभी धर्म के अपने-अपने शास्त्र भी है।हमारे भी 32 शास्त्र है। इनमें एक शास्त्र दसवेकालिक सूत्र। इस शास्त्र को साधु की माता भी कहा गया है। साधु बनने वाले को इसका अध्ययन करना आवश्यक माना जाता है। इस ग्रंथ की रचना आर्य प्रभव स्वामी जी के शिष्य आर्य शयमभव स्वामी ने अपने पुत्र मुनिराज का कम आयुष्य जानकर की थी। इसमें सब शास्त्रों की सर्वोच्च चीजों को एक स्थान पर लाने का प्रयास किया गया है। आज यह ग्रंथ संयमी आत्माओं के लिए एक पातेय रूप बन गया है।इसमें 10 अध्ययन वह 2 चूलिकाई दी गई है।
द्रुमपुष्पिका नामक प्रथम अध्ययन की पहली गाथा में बताया गया है कि अहिंसा,संयम और तप रूप धर्म उत्कृष्ट और मंगलकारी है।जिस पुरुष का मन धर्म में लगा रहता है उसे देवता भी नमस्कार करते हैं। 
धर्म की परीक्षा करने के लिए तीन कसौटी दी गई है। अहिंसा संयम और तप। क्योंकि जहां हिंसा होती हो वहां पर धर्म नहीं होता है।जहां इंद्रियों का असंयम होता हो,नाच गान आदि मनोरंजन होता हो, वहां भी धर्म नहीं होता है।और इच्छाओं पर लगाम नहीं लगाई जाती हो,वहां भी धर्म नहीं माना गया है। इसी के विपरीत जहां हिंसा नहीं होती, असंयम नहीं होता और इच्छाओं का निरोध होता हो वहां पर धर्म माना गया है।
प्रश्न उठता है कि धर्म कब करना चाहिए?जब तक शरीर में बुढ़ापा नहीं आए, रोग नहीं आए और इंद्रियों की शक्ति कमजोर नहीं होवे तब तक व्यक्ति को धर्म  का आचरण कर लेना चाहिए।गुरुदेव तो फरमाते हैं कि जिस उम्र में कर्म बांधे जाते हैं,वही उम्र धर्म करने की होती है।धर्म को भूलकर भी बुढ़ापे पर नहीं छोड़ना चाहिए।धर्म क्यों करना चाहिए? धर्म अपनी आत्मा के कल्याण के लिए करें,अपने अशुभ कर्मों की निर्जरा के लिए करें ,लेकिन किसी कामना, चाहना वह लालसा के लिए धर्म नहीं करें।
किससे धर्म होना चाहिए?तो धर्म केवल तन से ही नहीं बल्कि मन से भी होना चाहिए। मन,वचन और काया कि त्रिपुटी से धर्म करें।
इस अध्ययन में पुष्प और भवरे के माध्यम से साधु की आहार चर्या का वर्णन किया गया है। जिस प्रकार भंवरा बहुत सारे फूलों से थोड़ा-थोड़ा रस लेकर अपना पेट भरता है, उसी प्रकार से साधु भी बहुत सारे घरों से थोड़ा-थोड़ा आहार लेकर अपना निर्वाह कर लेता है। जिस प्रकार भंवरा फूलों पर सीधा नहीं बैठता, पहले मंडराता है।उसी प्रकार से साधु भी पहले आहार की गवेशना करके आहार ग्रहण करें।
     सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच ही आहार की चर्या करें।आसक्ति का त्याग करते हुए,दूसरे को भी पीड़ा नहीं पहुंचाते हुए, अपना जीवन निर्वाह करने का प्रयास करें।एक गाय की भांति।जैसे गाय दूर जंगल में जाकर घास खाती है और ऊपर ऊपर से ही घास खाती है, उसे जड़ से नहीं उखाड़ती, इस प्रकार साधु भी निर्दोष आहार चर्या का प्रयास करें।इस अध्ययन में बताए गए सूत्रों को जीवन में उतार कर जीवन को उन्नत बनाने का प्रयास करेंगे     तो सर्वत्र आनंद ही आनंद होगा।
धर्म सभा को पूज्य श्री विरागदर्शन जी महारासा ने भी संबोधित किया।
 धर्म सभा का संचालन हंसराज नाबेड़ा ने किया।

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